राफेल पर मोदी सरकार का दावा निकला झूठ! उपकरणों के साथ सिर्फ एक विमान मिलेगा, 35 विमान खाली मिलेंगे.

राफेल पर मोदी सरकार का दावा निकला झूठ! उपकरणों के साथ सिर्फ एक विमान मिलेगा, 35 विमान खाली मिलेंगे.

राफेल पर मोदी सरकार का दावा निकला झूठ! उपकरणों के साथ सिर्फ एक विमान मिलेगा, 35 विमान खाली मिलेंगे.

भारत और फ्रांस के बीच हुए रफाल लड़ाकू विमानों के सौदे की गुत्थी उलझती जा रही है। अब इसको लेकर एक और बड़ा खुलासा सामने आया है जो मोदी सरकार के आखिरी दावे को भी झूठा साबित कर रहा है।

मोदी सरकार लगातार ये दावा कर रही है कि चाहे उस पर डील में भ्रष्टाचार का आरोप हो लेकिन भारत को इस समझौते की मदद से जल्द ही अपनी ज़रूरत के मुताबिक तैयार विमान मिल जाएँगे। लेकिन हाल में आई एक रिपोर्ट ने मोदी सरकार के इस दावे पर भी सवाल उठा दिए हैं।

नए समझौते के बाद दावा किया जा रहा है कि सौदे की नई शर्तों के तहत भारत की ज़रूरतों के हिसाब से पूरी तरह तैयार हालत (फ्लाई अवे कंडीशन) में फ्रांस से 36 रफाल विमानों की आपूर्ति की जा रही है। लेकिन फ़्रांस पूरी तरह तैयार 36 नहीं बल्कि केवल एक विमान भारत को देगा जबकि बाकि 35 विमान भारत को खुद तैयार करने होंगे।

अब सवाल है कि अगर फ़्रांस सारे विमान तैयार स्तिथि में नहीं दे रहा है तो क्यों विमानों की कीमत बढ़ी। क्यों 560 करोड़ रुपए का विमान 1560 करोड़ रुपए में खरीदा गया। क्योंकि मोदी सरकार अबतक यही कह रही है कि उसकी डील में विमान पूरी तरह मांग के मुताबिक, उपकरणों से लैस हैं इसलिए कीमत बढ़ी है।

हाल ही में भाजपा के एक प्रवक्ता संबित पात्रा ने टीवी डिबेट के दौरान खाली बोतल और भरी बोतल का उदाहरण देते हुए बताया था कि क्यों उनकी सरकार ने विमानों की कीमत ज़्यादा दी है। लेकिन अब पता चला है की केवल एक विमान पूरी तरह उपकरणों से लैस आएगा और बाकि 35 खाली।

राफेल लड़ाकू एयरक्राफ्ट सौदे में भारत ने जिस तकनीकी विशेषताओं की मांग की है, फ्रांस वैसा केवल एक एयरक्राफ्ट अप्रैल 2022 तक सप्‍लाई करेगा। द इंडियन एक्‍सप्रेस को मिली जानकारी के अनुसार, बाकी 35 एयरक्राफ्ट सितंबर 2019 से भेजे जाने शुरू किए जाएंगे। इन एयरक्राफ्ट्स में अतिरिक्‍त फीचर भारत में ही जोड़े जाएंगे।

जबकि पहले ये दावा किया गया था की पूरी तरह तैयार विमान 2019 से ही भारत आना शुरू हो जाएँगे। जुलाई में, रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्‍य सभा में दिए गए जवाब में कहा था कि “विमानन क्षमता तथा सहयोगी उपक‍रणों व हथियारों से लैस 36 राफेल एयरक्राफ्ट की डिलीवरी सितंबर 2019 से शुरू होगी और अप्रैल 2022 तक पूरी हो जाएगी।”

अख़बार के मुताबिक संशोधित सौदे में रफाल विमानों की निर्धारित कीमत को लेकर उभरे विवाद के बाद सरकार की ओर से सफाई दी गई थी।

बताया गया था कि चूंकि 36 विमान भारत की ज़रूरतों के हिसाब से पूरी तरह तैयार हालत में फ्रांस से आ रहे हैं। इसलिए कीमतें ऊपरी तौर पर ही बढ़ी हुई लग रही हैं। जबकि वास्तव में ये कीमतें यूपीए सरकार के समय हुए सौदे-समझौते के मुकाबले काफी कम हैं।

लेकिन अब इसी दावे को लगभग झुठलाने वाले तथ्य उभरकर सामने आ रहे हैं।

अख़बार को सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी को सच मानें तो फ्रांस में रफाल विमान को भारत की ज़रूरतों के हिसाब से तैयार करने का काम शुरू हो चुका है। इन बदलावों के साथ एक विमान का अगस्त-2017 से परीक्षण भी हो रहा है।

इसके लिए भारतीय वायु सेना के चार सदस्यों का दल तभी से फ्रांस में है। लेकिन इस सच का दूसरा पहलू ये है कि विमान में बदलाव की परीक्षण प्रक्रिया 2022 तक चलने वाली है। जिस विमान पर परीक्षण किए जा रहे हैं वह 2022 तक ही भारत आ सकेगा।

यानी भारत की ज़रूरत के हिसाब से पूरी तरह तैयार पहला राफेल विमान आपूर्ति प्रक्रिया के सबसे आख़िर में अप्रैल-2022 में आएगा। वहीं बाकी के जो विमान आएँगे वो बिना विशेष सामान के आएँगे और उन्हें भारत में ही अपनी ज़रूरतों के हिसाब से तैयार किया जाएगा। और इसमें भी 2022 तक का समय काग जाएगा। ये प्रक्रिया सितम्बर 2019 में शुरू होगी।

अख़बार ने इस बाबत रक्षा मंत्रालय, भारतीय वायु सेना और डैसॉल्ट एविएशन (रफाल विमान बनाने वाली फ्रांसीसी कंपनी) से प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की. लेकिन तीनों ने ही भेजे गए सवालों का ज़वाब नहीं दिया।

अब सवाल उठता है कि जब नए समझौते से ना तो पहले के मुकाबले जल्द ही तैयार विमान मिल रहे हैं। खुद ही अपनी ज़रूरतों के मुताबिक, विमान तैयार करने होंगे। तो पुराने समझौते को रद्द कर 2015 में नया समझौता करना का फायदा क्या हुआ? मोदी सरकार ने ऐसा कदम क्यों उठाया? क्या इसका उद्देश्य सिर्फ किसी एक व्यक्ति को लाभ पहुँचाना ही था।

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क्या है विवाद

राफेल एक लड़ाकू विमान है। इस विमान को भारत फ्रांस से खरीद रहा है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने विमान महंगी कीमत पर खरीदा है जबकि सरकार का कहना है कि यही सही कीमत है। ये भी आरोप लगाया जा रहा है कि इस डील में सरकार ने उद्योगपति अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाया है।

बता दें, कि इस डील की शुरुआत यूपीए शासनकाल में हुई थी। कांग्रेस का कहना है कि यूपीए सरकार में 12 दिसंबर, 2012 को 126 राफेल राफेल विमानों को 10.2 अरब अमेरिकी डॉलर (तब के 54 हज़ार करोड़ रुपये) में खरीदने का फैसला लिया गया था। इस डील में एक विमान की कीमत 526 करोड़ थी।

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इनमें से 18 विमान तैयार स्थिति में मिलने थे और 108 को भारत की सरकारी कंपनी, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), फ्रांस की कंपनी ‘डासौल्ट’ के साथ मिलकर बनाती। 2015 में मोदी सरकार ने इस डील को रद्द कर इसी जहाज़ को खरीदने के लिए 2016 में नई डील की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नई डील में एक विमान की कीमत लगभग 1670 करोड़ रुपये होगी और केवल 36 विमान ही खरीदें जाएंगें। नई डील में अब जहाज़ एचएएल की जगह उद्योगपति अनिल अंबानी की कंपनी बनाएगी। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रान्सफर भी नहीं होगा जबकि पिछली डील में टेक्नोलॉजी भी ट्रान्सफर की जा रही थी।

Courtesy: NewsHunt
Categories: International, Politics