नज़रियाः RBI की रिपोर्ट आ जाने के बाद अब नोटबन्दी के समर्थक ‘भक्तगण’ कहां हैं?

नज़रियाः RBI की रिपोर्ट आ जाने के बाद अब नोटबन्दी के समर्थक ‘भक्तगण’ कहां हैं?

सरकार के मूर्खतापूर्ण फ़ैसलों का विरोध करना ‘देशद्रोह’ नहीं है श्रीमान। यह जनहित का काम है, जिसे ‘अन्धभक्त’ कभी नहीं कर सकते! रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट आ जाने के बाद अब नोटबन्दी के समर्थक ‘भक्तगण’ कहाँ हैं? आख़िर सही कौन साबित हुआ?  क्या वह लोग सही साबित हुए जो नोटबन्दी को मूर्खतापूर्ण फ़ैसला बता रहे थे या वह लोग सही थे जो नोटबन्दी के आलोचकों को ‘देश-विरोधी’ और ‘मोदी-विरोधी’ बता रहे थे?

नोटबन्दी पर मैंने अपने पहले ही लेख में लिखा था कि नोटबन्दी से काला धन ख़त्म नहीं हो सकता और अगर होगा, तो भी बहुत मामूली ही। क्योंकि काला धन कोई करेन्सी में रखता ही नहीं है। उसे तो कहीं न कहीं सम्पत्ति में, सोने-चाँदी, हीरे-जवाहरात में, शेयर बाज़ार में, या देश-विदेश में उद्योग-धन्धे में खपा दिया जाता है।

वैसे यह सोचना ही आर्थिक अज्ञानता और मूर्खता है कि कोई अपना काला धन अपनी तिजोरी में करेन्सी में रखेगा। क्योंकि ताले में या बोरे में बन्द रखी गयी करेन्सी की क्रय शक्ति हर साल मुद्रास्फीति के कारण घटती जाती है। इसे इस उदाहरण से समझिए कि यदि किसी ने दस साल पहले दस लाख रुपये के नोट अपनी तिजोरी में बन्द करके रख दिये, तो आज क्या उन दस लाख रुपयों का मूल्य वही होगा, जो दस साल पहले था? वह घट कर आधा भी नहीं रह जायगा! इसलिए कौन मूर्ख काले धन को करेन्सी में रखेगा?

और जो लोग अरबों-खरबों के काले धन का धन्धा करते हैं, उन्हें आप इतना ही मूर्ख समझते हैं क्या कि वह काले धन को नोटों में रख कर बैठेंगे? करेन्सी में काला धन केवल उतने समय के लिए यानी कुछ दिनों या महीनों के लिए रहता है, जब तक उसे कहीं खपाया न जा सके। इसलिए काले धन का बहुत छोटा हिस्सा ही करेन्सी में रहता है, यह सामान्य गणित है।

नोटबन्दी के बाद जो लोग यह सामान्य-सा गणित, यह सच्चाई जनता को बता रहे थे, उन्हें ‘ग़द्दार,’ ‘देश-विरोधी,’ ‘आतंकवाद और नक्सलवाद समर्थक’ और जाने क्या-क्या कह कर गालियाँ दी जा रही थीं। कहा जा रहा था कि वह तो मोदी सरकार के हर क़दम का विरोध ही करेंगे, चाहे सरकार कितना भी अच्छा काम करे।लेकिन अब सच्चाई सामने आ ही गयी और समय ने सिद्ध कर दिया कि कौन सच बोल रहा था और कौन झूठा था?

रिज़र्व बैंक ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में साफ़-साफ़ बता दिया है कि पुरानी करेन्सी के 99.3% नोट रिज़र्व बैंक के पास वापस लौट आये हैं। यानी केवल कुल पुरानी करेन्सी का 0.7% हिस्सा ही बैंकों में वापस नहीं लौटा। मतलब यह कि 15.41 लाख करोड़ रुपये की पुरानी करेन्सी में से केवल दस हज़ार करोड़ रुपये की करेन्सी ही वापस नहीं लौटी।

नोटबन्दी के तुरन्त बाद लिखे गये मेरे लेख को अब क़रीब 21 महीने बाद आप दुबारा पढ़ना चाहें, तो लिंक कॉमेंट बॉक्स में दे रहा हूँ। इस लेख में यही लिखा गया था कि यह बेवक़ूफ़ी भरा विचार है कि नोटबन्दी से काला धन ख़त्म हो जायेगा।

आज सच्चाई यह है कि न काला धन पकड़ में आया और न ‘कैशलेस इकॉनॉमी’ में कोई उल्लेखनीय सफलता मिली। नोटबन्दी के पहले जहाँ 15।41 लाख करोड़ की करेन्सी चलन में थी, वहीं जून 2018 के रिज़र्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़ अब 19।3 लाख करोड़ की करेन्सी चलन में है। तो फिर नोटबन्दी से क्या मिला?

Courtesy: nationalspeak.

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