गिरता रुपया: इशारों-इशारों में वरुण गांधी ने मोदी सरकार को घेरा

गिरता रुपया: इशारों-इशारों में वरुण गांधी ने मोदी सरकार को घेरा

बीजेपी के युवा सांसद वरुण गांधी ने एक बार फिर अपनी पार्टी और सरकार के खिलाफ बगावती तेवर दिखलाए हैं. उन्होंने मौजूदा समय में भारतीय रुपये के गिरते स्तर को लेकर लेख लिखकर इशारों-इशारों में अपनी ही सरकार के खिलाफ सवाल खड़े किए हैं. वरुण गांधी ने लिखा है कि एक समय भारतीय रुपये की ऐसी धाक थी कि दुनिया के कई देशों में चलती थी, लेकिन आज भारतीय करेंसी पिटती दिख रही है.

उन्होंने लिखा है कि एक ऐसा दौर था जब भारतीय रुपया बहुपक्षीय मुद्रा था. जावा, बोर्नियो,  मकाऊ, मस्कट, बसरा, जंजीबार जैसे देशों में भारतीय रुपये का इस्तेमाल होता था. ओमान 1970 तक रुपये का इस्तेमाल करता था.

वरुण गांधी ने लिखा है कि इधर काफी समय से तेल के ऊंचे भाव और शेयर बॉन्डो से संस्थागत विदेशी निवेशकों के निकलने के चलते रुपये की कीमत गिर रही है. ऐसे उतार चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन रुपये की गिरती कीमत का मतलब है ज्यादा आयात का बोझ, जिससे मुद्रा संकट बढ़ता है.

उन्होंने लिखा है कि रुपये में काले धन का लेन-देन को खत्म करके भारतीय अर्थव्यवस्था के औपचारिक क्षेत्र को मजबूती देना जरूरी होता है. भारत को काले धन के खिलाफ चार बिंदुओं पर विचार करना होगा. टैक्स रेट को तर्कसंगत बनाना, कमजोर क्षेत्र सुधारना, कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना और कर चोरी निवारण के उपाय करना.

बता दें कि पहली बार नहीं है जब वरुण गांधी ने मोदी सरकार के खिलाफ बगावती तेवर दिखाए हैं. चुनाव आयोग की भूमिका पर कड़े सवाल उठाते हुए उन्होंने चुनाव आयोग को बिना दांतों और शक्तियों वाला संस्थान कहा था. जबकि उससे एक दिन पहले ही केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव आयोग को स्वतंत्र संस्था बताया था.

रोहिंग्या मुसलमानों पर मोदी सरकार की राय से अलग वरुण ने कहा था, वह चाहते हैं कि रोहिंग्या मुसलमानों को शरण दी जाए. म्यांमार में अत्याचार से परेशान होकर बांग्लादेश भारत पहुंच रहे इन रोहिंग्या मुसलमानों को भारत सरकार ने खतरा बताते हुए शरण देने से मना कर दिया था.

वरुण ने इससे पहले केंद्रीय वन मंत्रालय द्वारा वन विभाग की जमीनों को दूसरे उद्देश्य से देने पर आपत्ति जताई थी. उन्होंने कहा कि वन विभाग की जमीन को दूसरे उद्देश्य के लिए देना ठीक नहीं है. वन विभाग ऐसे ही जमीन देता रहा तो फिर आखिरकार हम सांस के लिए शुद्ध हवा कहां से लाएंगे. जबकि हम पहले से ही दमघोंटू माहौल में रह रहे हैं.

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