उस दिन सोनिया गांधी के मन में सबसे बड़ा सवाल था- सबको कैसे बताऊं?

उस दिन सोनिया गांधी के मन में सबसे बड़ा सवाल था- सबको कैसे बताऊं?

उस दिन सोनिया गांधी को एम्स तक जाने का रास्ता सबसे लंबी यात्रा लग रही थी. वो लगातार कह रही थी ‘हे भगवान जल्दी चलिए’. उस वक्त गाड़ी में हर जगह खून बिखरा पड़ा था. सोनिया के गाउन पर, इंदिरा की साड़ी पर और कार की सीट पर.

नई दिल्ली: ”इंदिरा, बुढ़ी औरतों की सरकार में एकमात्र पुरुष हैं” भारतीय राजनीति में जिस शख़्सियत के लिए यह गया था वह थी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी. इस बात का जिक्र स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो की सोनिया गांधी पर लिखी किताब ‘ द रेड साड़ी’ में किया गया है. वही इंदिरा गांधी जो भारतीय राजनीति की सबसे ताकतवर महिला मानी जाती रहीं. वही इंदिरा जो राजनीतिक उथल-पुथल, अकाल और तमाम अलग-अलग परेशानियों के होते हुए भी प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत करने में लगी रहीं. जब याहयां खान ने 40 हजार सैनिकों को पूर्वी पाकिस्तान भेजकर वहां जनसंहार शुरू किया और उनके दोस्त शेख मुजीबर रहमान को बंदी बना लिया तो भारत के सैन्य प्रमुख मानेक शॉ को युद्ध छेड़ने की इजाजत देने वाली इंदिरा गांधी ही थीं. इंदिरा की हिम्मत ही थी जो पाकिस्तान से अलग एक नया राष्ट्र बांग्लादेश बना और दबाव में आकर याहयां खान ने शेख मुजीबर रहमान को रिहा कर दिया.

 

इंदिरा की हिम्मत उस वक्त भी देखी गई जब उन्होंने ऑपरेशन ब्लूस्टार के जरिए आंतकियों का सफाया किया. इंदिरा गांधी के इस कदम के बाद कई सिख उनके दुश्मन हो गए. इंदिरा को कभी किसी बात से डर नहीं लगा और यही कारण था कि उन्होंने ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद भी अपने अंगरक्षकों की टोली में कई सिखों को रखा और जो बाद में उनकी मौत का कारण बने जब उनके दो सिख अंगरक्षक बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने उनकी गोली मार कर हत्या कर दी.

 

इंदिरा गांधी की मौत से एक दिन पहले यानी 30 अक्टूबर को वह एक चुनावी सभा को संबोधित करने गई थी. रेड साड़ी किताब में इस बात का जिक्र है. किताब में लिखा गया है “30 अक्टूबर 1984 के दिन इंदिरा गांधी को उड़ीसा में एक बड़ी सभा को संबोधित करना था. हमेशा की तरह उनका भाषण उनकी सूचना सलाहकार एचवाई शारदा प्रसाद ने तैयार किया था, लेकिन इंदिरा जब मंच पर जनता को संबोधित करने पहुंचीं तो उस वक्त उन्होंने शारदा प्रसाद की लिखी स्क्रिप्ट को भूल कर अपना भावनात्मक भाषण जनता के सामने रख दिया. उन्होंने कहा ” मैं आज हूं और हो सकता है कल यहां न रहूं, लेकिन जब मैं मरूंगी तो मेरे खून का हर एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा.”

इंदिरा गांधी की कही बात से सब आश्चर्यचकित थे. लेकिन इंदिरा ने जो कहा वही नियति ने सच कर दिया और उनको हिंसात्मक तरीके से मार दिया गया. भाषण के बाद इंदिरा वापिस दिल्ली आईं, उस रात इंदिरा को नींद नहीं आ रही थी. मानो उन्हें अनहोनी की भनक लग गई हो. किताब में लिखा गया है कि ”30 अक्टूबर की रात में इंदिरा जाग ही रही थीं कि तभी  सोनिया गांधी अपनी दवाई खाने के लिए उठीं. इंदिरा भी सोनिया को देख कर उठ गईं और दवाई तलाशने में सोनिया की मदद करने लगीं. उन्होंने सोनिया से कहा कि उन्हें किसी भी चीज की जरूरत हो तो बता दें वह जाग ही रही हैं.”

30 अक्टूबर की रात बीत गई और अगले दिन सुबह लगभग 7: 30 बजे तक इंदिरा गांधी तैयार हो चुकी थीं. इंदिरा ने उस दिन केसरिया रंग की साड़ी पहनी थी. हर दिन की तरह उस दिन भी उनका कार्यक्रम काफी व्यस्त था. सबसे पहले उन्हें उस्तीनोव से मिलना था जो इंदिरा पर उन दिनों एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बना रहे थे. इसके बाद उन्हें ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री जेम्स कैलेघन और मिज़ोरम के एक नेता से मिलना था और उस दिन शाम में ब्रिटेन की राजकुमारी ऐन को भोज देने वाली थीं.

इंदिरा ने तैयार होने के बाद नाश्ता किया और लगभग 9 बजकर 10 मिनट पर इंदिरा बाहर आईं. उनके साथ उस दिन सिपाही नारायण सिंह, आरके धवन, रामेश्वर दयाल थे. इंदिरा चलते हुए आरके धवन से बात कर रही थीं. धवन इंदिरा गांधी को बता रहे थे कि उन्होंने उनके कहने पर राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को संदेश भेज दिया है कि वह दिल्ली आ जाएं ताकि वह भी इंदिरा के साथ राजकुमारी एन को दिए जाने वाले भोज में शामिल हो सकें.

 

किताब में आगे लिखा गया है कि ”धवन और इंदिरा बात करते हुए एक अकबर रोड को जोड़ने वाले विकेट गेट पर पहुंचे ही थे कि वहां उनकी सुरक्षा में मौजूद सुरक्षाकर्मी बेअंत सिंह ने उन पर गोली चला दी. गोली इंदिरा के पेट में लगी. इसके बाद बेअंत सिंह ने इंदिरा गांधी पर 2 और गोली प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से चलाई. उनमें से एक गोली उनके सीने में लगी और वह खून से लथपथ होकर नीचे गिर पड़ीं. बेअंत सिंह के 3 गोली चलाने के बाद वहीं पास में खड़े दूसरे सुरक्षाकर्मी सतवंत ने भी इंदिरा के शरीर में एक के बाद एक ऑटोमैटिक कारबाइन की पच्चीस गोलियां उतार दीं”

 

सबकुछ अचानक और इतना जल्दी हुआ कि इंदिरा के साथ मौजूद लोग कुछ समझ नहीं पाए, लेकिन जैसे ही ये क्रूर घटना समझ में आई सबसे पहले इंदिरा की तरफ रामेश्वर दयाल दौड़े लेकिन सतवंत ने उन पर भी गोली चलाई और वह भी गिर गए. गोलियों की आवाज से एक अकबर रोड पर अफरा-तफरी मच गई. पुलिस अफसर दिनेश कुमार गोलियों की आवाज सुनकर बाहर आए.

 

इंदिरा गांधी को जमीन से उठाकर तुरंत एक सफ़ेद एंबेस्डर कार की पिछली सीट पर रखा गया. आगे की सीट पर धवन और ड्राइवर बैठे. किताब ‘रेड साड़ी’ में जेवियर मोरो लिखते हैं “जैसे इंदिरा को लेकर कार चलने लगी पीछे से उनकी बहू सोनिया गांधी मम्मी..मम्मी आवाज लगाती हुआ भागी आ रही थीं. सोनिया बहुत घबराई हुई थीं और नंगे पैर भागे आ रही थीं. सोनिया जब गाड़ी में बैठी तो चिल्लाने लगी, ‘ओह मम्मी! ओह गॉड.’ सोनिया लगातार इंदिरा से बात कर उन्हें आंख खोले रखने को कह रही थीं. एम्स तक जाने का रास्ता सोनिया को सबसे लंबी यात्रा लग रही थी. वो लगातार कह रही थीं ‘हे भगवान जल्दी चलिए’. ‘ओह मम्मी प्लीज मरना मत’. वह बार बार गुहार लगा रही थीं और अपने गाउन की आस्तीन से इंदिरा का चेहरा साफ कर रही थीं. उस वक्त गाड़ी में हर जगह खून बिखरा पड़ा था. सोनिया के गाउन पर, इंदिरा की साड़ी पर और कार की सीट पर. सोनिया के मन में बार बार सवाल उठ रहे थे कि राजीव गांधी कहां हैं, बच्चे कहां है. सबको कैसे बताऊं. उनका दिल मानने को तैयार नहीं था कि सर्वनाश हो चुका है.”

कार एम्स पहुंची मगर वहां किसी को नहीं बताया गया था कि प्रधानमंत्री को गोली लगी है. इस वजह से कोई खास इंतजाम नहीं किया गया था. इसी वजह से काफी समय बर्बाद हो गया. मगर कुछ समय बाद ही वहां डॉक्टर गुलेरिया, डॉक्टर एमएम कपूर और डॉक्टर एस बालाराम पहुंच गए. डॉक्टरों ने हर संभव प्रयास किया. उनको 80 बोतल ख़ून चढ़ाया गया. डॉक्टरों की टीम को आभास हो गया था कि इंदिरा को बचाना नामुमकिन है. उनके शरीर में उनके हृद्य के अलावा कुछ भी सलामत नहीं था.

जब डॉक्टरों की टीम इंदिरा को बचाने की जद्दोजहद कर रही थी तब बाहर वेटिंग रूम में सोनिया बैठी थीं. रेड साड़ी किताब में सोनिया की उस वक्त की मनोस्थिति बयां करते हुए लिखा गया है,”सोनिया वेटिंग रूम में भरी आंखों के साथ बैठी थीं. तभी अस्पताल में इंदिरा की दोस्त पुपुल जयकर पहुंचीं. उन्होंने कहा कि ‘मुझे सोनिया सदमे में लगी. वह कुछ बोल भी नहीं पा रही थीं’. उन्होंने सोनिया से ज्यादा सवाल न कर के एक साड़ी उन्हें दी. सोनिया ने खून से रंगे गाउन को उतारकर साड़ी पहन ली.”

इस बीच डॉक्टरों की टीम ने इंदिरा को आठवें फ्लोर के ऑपरेशन थिएटर में ले जाने का फैसला किया. 12 डॉक्टरों की टीम को अब बस चमत्कार की उम्मीद थी. एम्स के बाहर इंदि्रा के समर्थकों की भारी भीड़ थी. पुलिस उन्हें काबू करने में लगी थी. इधर तमाम कोशिशों के बावजूद इंदिरा की जान नहीं बचाई जा सकी. आखिरकार उनके मौत की आधिकारिक घोषणा की गई. जिस महिला के हौसले चट्टान की तरह मजबूत रहे वो अब इस दुनिया से जा चुकी थीं.

किताब में सोनिया की मनोस्थिति और राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका का जिक्र करते हुए लिखा गया है, ”इंदिरा की मौत से सोनिया पूरी तरह टूट चुकी थी. उधर पोते राहुल गांधी और पोती प्रियंका को भी खबर दी गई. उस वक्त दोनों स्कूल में थे. सोनिया गांधी ने दोनों बच्चों को संभाला. जब उन्हें उनकी दादी की मौत की जानकारी मिली तो दादी के लाडले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी फूट-फूट कर रोने लगे. राजीव और सोनिया गांधी के साथ दूसरे परिजन उन्हें दिलासा दे रहे थे. जिस वक्त इंदिरा गांधी की देह को मुखाग्नि दी गई, तब राहुल गांधी अपनी मां सोनिया गांधी से लिपट गए थे.”

जब इंदिरा ने ऑपरेशन ब्लूस्टार चलाया था तो ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आशंका प्रकट की थी कि इंदिरा गांधी पर हमला हो सकता है, उनकी सुरक्षा से सभी सिख गार्ड्स को हटाया जाए लेकिन जब ये फ़ाइल इंदिरा के पास पहुंची तो उन्होंने उस पर लिखा,”आरंट वी सेकुलर? (क्या हम धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं?. इंदिरा को मालूम भी नहीं था कि उनका यह फैसला एक दिन उनकी जान ले लेगा.

 

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