चार कारण जिनके चलते मोदी सरकार और आरबीआई आमने-सामने हैं

चार कारण जिनके चलते मोदी सरकार और आरबीआई आमने-सामने हैं

केंद्र सरकार और आरबीआई के बीच घमासान खुलकर सामने आ चुका है. पहले भी सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच तनातनी होती रही है, लेकिन बयानबाज़ी इतनी खुलकर सामने नहीं आती थी. आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के भाषण के बाद यह तनाव सतह पर आया. उन्होंने बीते हफ्ते कहा था कि केंद्रीय बैंक टेस्ट मैच खेल रहा है और सरकार टी-20. जानकारों के मुताबिक यह एक तरह से सरकार को आरबीआई जैसे संस्थान में दखल न देने की चेतावनी थी. विरल आचार्य ने यह भी कहा कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता में दखल के परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं.

इस बयान पर प्रतिक्रिया में सरकार ने पहले संयम दिखाया. जानकारों के मुताबिक इसकी वजह यह थी कि यह विवाद ठीक उसी समय हो रहा था जब सरकार सीबीआई में हो रहे घमासान को लेकर विपक्ष के निशाने पर थी. लेकिन सरकार की चुप्पी ज्यादा दिन कायम नहीं रह पाई. मंगलवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने फंसे हुए कर्जों के लिए आरबीआई को जिम्मेदार ठहराया. स्वायत्त संस्थाओं की बात पर उन्होंने कहा, ‘किसी भी सरकार या संस्था से ज्यादा देश महत्वपूर्ण है.’ अब खबर आ रही है कि उर्जित पटेल ने 19 नवबंर को बैंक के बोर्ड की बैठक बुलाई है.
फिलहाल सरकार के रुख को देखते हुए लगता है कि आरबीआई में नीतिगत दखल के लिए नियम-कानून के पन्ने भी पलटे जा रहे हैं. तनाव इस कदर बढ़ चुका है कि कुछ जानकर मान रहे हैं कि हो सकता है कि आरबीआई के मौजूदा गवर्नर उर्जित पटेल अपना कार्यकाल भी न पूरा कर पाएं. एक समय मोदी सरकार के पसंदीदा बताये जा रहे उर्जित पटेल के इस्तीफे की भी चर्चा चल रही है. आखिर सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच एकाएक तनाव इस कदर क्यों बढ़ गया है?

कर्ज बांटने में सख्ती

बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के तहत आरबीआई ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के कर्ज देने पर खासी सख्ती कर दी है. 11 सार्वजनिक और एक प्राइवेट बैंक को कर्ज बांटने में कड़ाई बरतने के निर्देश दिए गए हैं. जानकारों के मुताबिक चुनावी साल में सरकार यह नहीं चाहती कि लोगों को कर्ज मिलने में इतनी परेशानी हो. सरकार चाहती है कि छोटे और मंझोले उद्योग को आसानी से कर्ज दिए जाएं. कुछ की मानें तो सरकार मुद्रा योजना के तहत आसानी से लोन बांटकर इसे अगले चुनाव में उपलब्धि की तरह पेश करना चाहती है. इसके अलावा नोटबंदी और जीएसटी से नाराज छोटे कारोबारियों को खुश करने का रास्ता भी कर्ज की आसान उपलब्धता हो सकता है.

लेकिन आरबीआई की बैंकों की सेहत सुधारने की मुहिम सरकार की इच्छा के आड़े आ रही है. आर्थिक जानकारों के मुताबिक वित्त मंत्री का यह कहना कि यूपीए की सरकार के समय बांटे गए खराब कर्जों पर आरबीआई ने लगाम नहीं लगाई, दरअसल इस खीझ से उपजा है कि आरबीआई अब मौजूदा सरकार को ऐसा क्यों नहीं करने दे रही है.

चुनावी साल में सरकार ज्यादा पैसा चाहती है

कई विश्लेषकों के मुताबिक सरकार के साथ आरबीआई की खींचतान की एक और वजह यह है कि वह केंद्रीय बैंक के लाभांश में और ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है. सरकार आरबीआई से काफी समय से यह मांग कर रही है कि लाभांश के तौर पर उसे ज्यादा रकम उपलब्ध कराने के लिए नियमों में बदलाव किया जाए. चुनावी साल होने के चलते केंद्रीय बैंक पर यह दबाव और बढ़ रहा है क्योंकि बजट के तमाम वादों को पूरा करने के लिए सरकार को ज्यादा पैसों की जरूरत होगी. लेकिन आरबीआई का मानना है कि मौजूदा आर्थिक हालात को देखते हुए अपनी बैलेंस शीट मजबूत रखना ज्यादा जरूरी है.

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