मोदी सरकार का इमरजेंसी डिलीवरी का दावा निकला ग़लत, CAG ने कहा- राफेल आने में अभी लगेंगे 7 साल

मोदी सरकार का इमरजेंसी डिलीवरी का दावा निकला ग़लत, CAG ने कहा- राफेल आने में अभी लगेंगे 7 साल

राफेल डील पर संसद में कैग की रिपोर्ट पेश कर दी गई है। कैग रिपोर्ट के मुताबिक राफेल डील यूपीए से 2.86 फीसदी सस्ते में हुई है। कैग रिपोर्ट में कहा गया है साल 2016 में मोदी सरकार की तरफ से साइन की गई राफेल फाइटर जेट डील 2007 में यूपीए सरकार की तरफ से प्रस्तावित डील की तुलना में 2.86 प्रतिशत सस्ती है।

मगर इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि राफेल को आने में अभी सात साल और लगेंगें। जबकि राफेल को लेकर वायुसेना के प्रमुख बीएस धनोआ ने सुप्रीम कोर्ट में जो कहा था उसे गौर किया जाना चाहिए, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि देश में युद्धक विमान राफेल पर हो रही राजनीति का बुरा असर कहीं देश की सैन्य तैयारियों पर न पड़े।

राफेल के आने में देरी का जिक्र करते हुए उन्होंने देश को एक बार फिर चेताया था कि पड़ोसी मुल्कों ने अपने युद्धक विमान अपग्रेड कर लिए हैं और हमें अभी तक इनके मिलने का इंतजार है।

कैग रिपोर्ट में राफेल डिलीवरी को लेकर क्या कहा गया है ?

याद हो की रक्षा मंत्री और मोदी सरकार बार बार ये कहती रही है की उसने पिछली डील कैंसिल इसलिए की क्योंकि उसे जल्द से जल्द विमान चाहिए यानी कि इमरजेंसी डिलीवरी की बात संसद में बोली गई थी। मगर कैग रिपोर्ट ने ये साफ़ कर दिया गया है कि राफेल विमानों की डिलीवरी में सात साल से भी अधिक की देरी हो सकती है।

मोदी सरकार पिछली डील कैंसिल करते हुए 126 विमानों की जगह महज 36 राफेल फाइटर जेट खरीद रही है जबकि कैग रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि यूपीए सरकार के समय में साइन किए गए भारत व फ्रांस के बीच की डील में डिलीवरी के समय में सिर्फ एक महीने का ही सुधार हुआ है।

इस डिलीवरी को लेकर सौदे के वक्त राफेल का निर्माण करने वाली दसॉ एविएशन के पास पहले से ही 83 एयरक्राफ्ट्स बनाने और डिलीवरी करने का काम बाकी था। क्योंकि कंपनी हर साल सिर्फ 11 ही एयरक्राफ्ट बना पाती है। इस वजह से सभी 36 विमानों को पूरा करने में लगभग सात साल से ज्यादा का समय लग जाएगा।

वहीं इस रिपोर्ट में कैग प्रमुख राजीव महर्षि जो खुद राफेल सौदे के समय वित्त सचिव थे। उनके दावे पर आँख मूंदकर कैसे भरोसा कर लिया गया और तो और इस रिपोर्ट में भी मोदी सरकार पर उठाए गए सवाल का ज़िक्र कहीं नहीं है। जबकि इस रिपोर्ट में साफ़ साफ़ कहा गया है कि ये समझौता देशहित में नहीं है।

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