टीवी चैनलों पर ‘एंकर’ ऐसे चीख रहे हैं जैसे अगले ब्रेक से पहले उनको युद्ध की ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ चाहिए

टीवी चैनलों पर ‘एंकर’ ऐसे चीख रहे हैं जैसे अगले ब्रेक से पहले उनको युद्ध की ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ चाहिए

टीवी चैनलों पर एंकर ऐसे चीख रहे हैं जैसे अगले ब्रेक से पहले-पहले उनको युद्ध की ब्रेकिंग न्यूज़ चाहिए। कोई बदला हैशटैग चला रहा है, किसी को पाकिस्तान ही नक्शे से हटा देना है। मीडिया की इस चाल से होशियार रहिए। नफ़रत के इस सैलाब के बीच आपको अकेला खड़ा करके वो कब ‘छोटे से ब्रेक’ के बहाने चले जाएंगे आपको पता भी नहीं चलेगा।

अगर आपको पूछना है तो पूछिए इनसे कि वो सीआरपीएफ जिसके लिए आज ये घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं, चीख पुकार कर रहे हैं इनकी सुध पिछली बार कब ली थी। बीती 13 दिसंबर को यही सीआरपीएफ वाले अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आए थे, वो चाहते थे उन्हें ‘सैनिक’ का दर्जा दिया जाए, उन्हें पेंशन मिले।

याद कीजिए उस दिन टीवी पर क्या चल रहा था, क्या एक भी न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर वहां पहुंचा था, कोई विजुअल याद है आपको, गुजरात, केरला और ओडिशा और देश के तमाम हिस्सों से आए उन सीआरपीएफ के जवानों की एक बाइट भी सुनी आपने… नहीं।

हां, आपको याद होगा कि रणवीर सिंह, करन जौहर, आलिया भट्ट और कुछ और कलाकार आए थे प्राइवेट जेट में। मांग थी कि फिल्म के टिकट पर लगने वाला जीएसटी कम किया जाए। उनकी मांग फौरन मांग ली गई और एक सेल्फी के बाद वो उसी प्राइवेट जेट से वापस चले गए।

ये है हमारी चीखती, धार्मिक उन्माद फैलाती मीडिया अगर वाकई सीआरपीएफ जवानों से हमदर्दी रखती है तो क्यों नहीं पूछती कि आखिर सरकार इन्हें ‘अर्ध-सैनिक’ क्यों मानती है। क्यों इन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया जाता।

कारोबारी, अमीर और खाए-पिये अघाए लोगों के बच्चे सेना में नहीं जाते, सेना में उसे ग़रीब मज़दूर और किसान के बच्चे जाते हैं जिनपर पानी की बौछार की गई थी, जिनके दिल्ली में घुसने पर रोक लगा दी गई थी। क्या इस बारे में किसी ने कोई आवाज़ उठाई, नहीं।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सिर्फ शहीद जवानों के जनाज़े की वीडियो के पीछे फिल्मी गाने लगाकर आपको भावुक कर देना चाहता है, ताकि आप कोई सवाल न पूछें। आप भूल जाएं कि जो हुआ है उसके लिए सवाल किससे पूछना चाहिए। आप को बरगला दिया गया है कि ये गर्व का मौका है।

किस बात का गर्व करें, इस बात का? कि कई माओं ने अपने बच्चे खो दिये, कई औरतें विधवा हो गईं, बूढ़े बाप का सहारा छिन गया। ये गर्व का मौका नहीं अफ़सोस का मौका है, हमारी एजेंसियों और सरकार से चूक हुई है। उनके हाथ 44 जवानों के खून से रंगे हुए हैं।

ऐसा गर्व किस काम का कि गर्व करते हुए आप शहीदों की शहादत को भुलाकर नई ट्रेन का उद्घाटन करने पहुंच जाएं और मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवाएं, आपके राष्ट्रीय अध्यक्ष कर्नाटक में चुनावी सभा करें और पार्टी के दिल्ली अध्यक्ष कार्यक्रम में नाचते गाते रहें… सिर्फ इसलिए कि ये गर्व का विषय है? आप कीजिए गर्व… मेरे लिए ये ग़म की घड़ी है और आप से सवाल पूछने का मौका है, और मैं पूछता रहूंगा।

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