सोनभद्र में प्रियंका गांधी के संघर्ष ने दादी इंदिरा के बेलछी दौरे की दिला दी याद

सोनभद्र में प्रियंका गांधी के संघर्ष ने दादी इंदिरा के बेलछी दौरे की दिला दी याद

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा को शुक्रवार को सोनभद्र जाने से रोक दिया गया है. जिसके बाद वह वाराणसी के सड़क पर ही बैठ गईं और जोर देने लगीं कि उन्हें आगे जाने की इजाजत दी जाए.

जिसके बाद वहां मौजूद अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में ले लिया और उन्हें एक अतिथि गृह ले जाया गया. प्रशासन के आला अधिकारियों ने बाद में उन्हें मनाने की काफी कोशिश की, मगर वह पीड़ित के परिजनों से मिलने देने या फिर जेल भेजने की बात पर अड़ गयीं.

उन्होंने वारदात में मारे गये लोगों के परिजन को 25-25 लाख रुपये का मुआवजा और जमीन पर मालिकाना हक दिए जाने की भी मांग की.

बता दें कि इस हफ्ते सोनभद्र में 90 बीघे के ज़मीन विवाद में 10 लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी.

प्रियंका गांधी का कहना है कि अधिकारी उनसे वापस जाने की बात कह रहे हैं लेकिन वो पीड़ित परिवार से मिले बिना टस से मस नहीं होंगी.

प्रियंका गांधी का जब राजनीति में पदार्पण हुआ था तो मीडिया में उनकी तुलना बार-बार उनकी दादी इंदिरा गांधी से की जा रही थी. हालांकि अब तक यह तुलना सिर्फ शक्ल-सूरत को लेकर थी लेकिन ताज़ा घटना क्रम ने एक बार फिर से इंदिरा गांधी को याद करने को मजबूर कर दिया है.

पटना ज़िले के बेलछी गाँव में साल 1977 में कुर्मी समुदाय के लोगों ने 14 दलितों की हत्या कर दी थी. जिसके बाद सत्ता से बेदखल हो चुकीं पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कई लोगों के मना करने के बावजूद हाथी पर बैठ कर बाढ़ से घिरे इस गांव का दौरा किया था.

स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो ने ‘द रेड साड़ी’ नाम से सोनिया गांधी की आत्मकथा लिखी है.

किताब के मुताबिक- 1977 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद इंदिरा गांधी राजनीतिक संन्यास लेने की सोच रही थीं. सोनिया उस वक़्त राजनीति में नहीं थी.

वो इंदिरा गांधी के लिए चाय बनाते हुए उन्हें दिलासा दे रही थीं कि सब ठीक हो जाएगा. तभी दोनों के बीच बिहार के बेलछी नरसंहार को लेकर चर्चा हुई.

इंदिरा गांधी ने बिहार दौरे पर जाने की अपनी इच्छा से सोनिया को अवगत कराया. लेकिन तब सोनिया गांधी ने उन्हें यह कहते हुए मना किया कि, “सुना है बिहार बहुत खतरनाक जगह है. सुरक्षा के लिहाज से आप वहां मत जाइए.”

तना ही नहीं पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने भी इंदिरा गांधी के इस दौरे का समर्थन नहीं किया.

कई लोगों की मनाही के बावजूद वो बेलछी के लिए रवाना हो गई. गांव पहुंचने के लिए नदी पार करना था लेकिन कोई नाव नहीं था. ऊपर से शाम भी तेज़ी से ढलती जा रही थी. इन सबके बावजूद वो पैदल ही गांव के लिए चलने लगीं. उनके साथ पार्टी के अन्य कई और नेता भी थे. कार्यकर्ताओं ने तुरंत जीप की व्यवस्था की लेकिन कच्चे रास्ते और पानी जमाव की वजह से जीप पानी में फंस गईं. बाद में ट्रैक्टर मंगवाया गया लेकिन वो भी ज़्यादा दूर तक साथ नहीं दे पाया.

जिसके बाद मोती नाम का एक हाथी बुलाया गया और यह यात्रा पूरी हुई. सोनिया गांधी इस घटना का ज़िक्र करते हुए कहती हैं-

13 अगस्त 1977, बहुत तेज बारिश हो रही थी. पटना से बेलछी जाने के जाने के रास्ते पर कई जगह पानी भर गया था. कीचड़ की वजह से चलना मुश्किल था. रास्ता इतना खराब हो गया था कि कार से आगे जाना नामुमकिन हो गया. सभी लोगों ने कहा कि अब ट्रैक्टर से ही आगे जाना संभव है. मैं अन्य सहयोगियों के साथ ट्रैक्टर पर चढ़ी. ट्रैक्टर कुछ दूर ही चल पायी थी कि चक्का कीचड़ में फंस गया.

मौसम और रास्ते की हालत देख कर साथ चल रहे सहयोगियों ने कहा कि बेलछी जाने का कार्यक्रम स्थगित कर देना चाहिए. लेकिन उनके सिर पर धुन सवार था कि किसी भी तरह बेलछी पहुंचना है. पीड़ित दलित परिवार से हर हाल में मिलना है.

इंदिरा सोनिया से घटना का ज़िक्र करते हुए कहती हैं- ‘मैंने कहा, जो लौटना चाहते हैं वे लौट जाएं, मैं तो बेलछी जाऊंगी ही. मैं जानती थी कि कोई नहीं लौटेगा. कीचड़- पानी के बीच हम आगे बढ़ते रहे. आगे जाने पर एक नदी आ गयी. नदी पार करने का कोई उपाय नहीं था. शाम हो चली थी. गांव वालों से नदी पार करने के बारे में पूछा. तब उन्होंने बताया कि यहां के मंदिर में एक हाथी है लेकिन हाथी पर बैठने का हौदा नहीं है. मैंने कहा, चलेगा. हाथी का नाम मोती था. उस पर कंबल और चादर बिछा कर बैठने की जगह बनायी गयी. सबसे आगे महावत बैठा. उसके बाद मैं बैठी, फिर मेरे पीछे प्रतिभा पाटिल बैंठी. प्रतिभा काफी डरी हुईं थीं. वे कांप रहीं थीं और मेरी साड़ी का पल्लू कस कर पकड़े हुए थीं. जब हाथी नदी के बीच पहुंचा तो पानी उसके पेट तक पहुंच गया. अंधेरा घिर आया था. बिजली कड़क रही थी. ये सब देख कर थोड़ी घबराहट हुई लेकिन फिर मैं बेलछी के पीड़ित परिवारों के बारे में सोचने लगी. जब बेलछी पहुंची तो रात हो चुकी थी. पीड़ित परिवरों से मिली. मेरे कपड़े भींग चुके थे. मेरे पहुंचने पर गांव के लोगों को लगा जैसे कोई देवदूत आ गया है. उन्होंने मुझे पहनने के लिए सूखी साड़ी दी. खाने के लिए मिठाइयां दीं. फिर कहने लगे आपके खिलाफ वोट किया, इसके लिए क्षमा कर दीजिए.

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